poetry

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हसरतों की कोई हद तो दिखती नहीं

हसरतों की कोई हद तो दिखती नहींझील ये चाहती है कि सागर मिलेआँख ढूँढ़े कोई तेरी तस्वीर हाँदिल से मैंने कहा अब तू आहें न भररात है ये ज़रा सी गुजर जाने देवो सवेरा है रातों को धो जाएगी

season, children, leaves

नज़्म:- हक़-ए-इंतज़ार दिया है तुमने

हक़-ए-इंतज़ार दिया है तुमनेख़ातिर फ़िराक़-ए-वस्लज़रिया न बताया गोयाथमने का मुसलसल साँसइक माकूल तरीका जीने काएक बेग़ैरत-सी मौततन्हाई में तन्हा नहीं मैंखौफ़ नहीं दे खौफ़इश्क़ के फूल उगे जिन शाखों परवहीं जमे ज़िन्दगी के शूल देखोख़बर देर से देते हो ये ठीक है, मगरहाल भी तो कभी अपना मक़बूल लिखो शब्दार्थ:- फ़िराक़ ए वस्ल – मिलन …

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bed, bloom, flower

तुम्हारे नाम के साथ एक ज़िन्दगी

ख़्वाब देखा करो ख्वाहिशें करते चलोऔर हौले-हौले ज़िन्दगी में ढलते रहोउम्मीद घना एक कोहरा हैख़ुशनुमा मगर एक कोहरा हैधुँधला एक लंबा सफ़र करते रहोगिरी शाख की जगह से फिर पीक आएगा क्या?पता नहीं, लेकिन पुरानी शाख गिराकरएक नया अरमान लिए चलते रहोसारी इच्छाएँ चाहतें नदिया सी हैंकौन कहाँ गुम हो जाए ?किसमें कौन-सी मिल जाए …

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ख़ालीपन

बेकार कहें ये लोग मुझेकहें,कोई काम नहीं आता,तन्हा ही बैठा रहे हमेशागुमसुम-सा फिरता रहता है,वो समझें मैं बर्बाद हुआऔर मैं,मैं देखता हूँ जब शख्स कोईतो सोचता हूँहर एक की वही रवानी है,वही सुबह अखबार में खोईदफ्तर से शाम थकी आईऔर रात को बड़ा गहरा ग़म हैमानोआती सुबह कोई मातम है,चाभी-भरी घड़ी हो जैसेआदमी भी चलता …

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rose, blossom, bloom

गुलाब और तुम

पेड़ ने कब चाहा था,काँटों को,लेकिन,एक गुलाब खिलाने को,कितने काँटों को सींचा था,आसमाँ को ताकते गुलाब ने,कभी देखा ही नहीं,तुम भी तो नहीं जानती हो,तुम्हारे अनजाने रूठे मन को,मनाने को,तेरी मुस्कान का प्यासा मेरा मन,कितना रूठा है मुझसे

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टुकड़ा टुकड़ा प्यार

प्यार का न होना कोई बुरा नहींबिना प्यार के भी ज़िन्दा रह सकते हैंसूखे फूलों को सहेजा जा सकता हैबुरा है उसका पंखुड़ियों में बिखर जानाटुकड़ा टुकड़ा प्यार में कोई जी नहीं सकताजी भी ले फिर आदमी वो रह नहीं सकता इश्क़ हुआ था एक नादान को नादान सेतैरने से दोनों ही वो अनजान थे …

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ग़ज़ल-जितने दर्दे-दिल के यहाँ फ़साने हैं

जितने दर्दे-दिल के यहाँ फ़साने हैंपास मेरे जीने के उतने बहाने हैं कौन कहता है मुश्किल मुहब्बत को पानाबस कायदे इश्क़ के ज़रा मनमाने हैं हम दोनों में कुई पहचान पुरानी हैवरना इस दुनिया में कितने अजाने हैं गरज़ है मेरी तेरे शिकवे सुनने कीतेरी आवाज़ के कान मेरे दिवाने हैं बादल अपनी तड़प गरज …

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कोरोना और मंथन
(आकाश, नदी और मानव का)

मेरा रंग आसमानी हैमैं ये भूला था बरसों सेगए इन कुछ दिनों में परन जाने क्या हुआ ऐसामेरे दामन की सब कालिख़मिली थी जो मुझे जबरनमिटी कुछ इस सलीखे सेनदी को आईना करकेनिहारा मैंने जब खुद कोमुझे ऐसा लगा जैसेनया एक जन्म पाया होकि जैसे श्राप-मुक्ति सेपुनः देवत्व पाया हो मैं जीवनदायिनी सबकीमुझे माता पुकारें …

कोरोना और मंथन
(आकाश, नदी और मानव का)
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