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नज़्म:-‘जागते-जागते इक उम्र कटी हो जैसे’

जाने क्या बात इशारात करे है दिल मेंआहटें द्वार करे बेज़ार करे पल-पल मेंहिज़्र की रात में अक्सर ये गुमाँ होता हैवो है यहीं छुपके मुझे देख रही हो जैसेबंद आँखें यही महसूस किया करती हैकानों के करीब तेरी साँस उठी हो जैसेख़ाब की बात भी लगती है मुझे ख़ाबों-सीतुझको न देखके आँखें भी पिघलती …

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