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नज़्म:- हक़-ए-इंतज़ार दिया है तुमने

हक़-ए-इंतज़ार दिया है तुमनेख़ातिर फ़िराक़-ए-वस्लज़रिया न बताया गोयाथमने का मुसलसल साँसइक माकूल तरीका जीने काएक बेग़ैरत-सी मौततन्हाई में तन्हा नहीं मैंखौफ़ नहीं दे खौफ़इश्क़ के फूल उगे जिन शाखों परवहीं जमे ज़िन्दगी के शूल देखोख़बर देर से देते हो ये ठीक है, मगरहाल भी तो कभी अपना मक़बूल लिखो शब्दार्थ:- फ़िराक़ ए वस्ल – मिलन …

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