ग़ज़ल

poem, sadness, literature

क़िसमत तब मुझसे नाराज़ बड़ी थी

क़िसमत तब मुझसे नाराज़ बड़ी थीजब,कि तू मेरे साथ साथ खड़ी थी ना भूलने की इक इबादत की थी सोअब याद करने को इक उम्र पड़ी थी मौत हुई थी, मेरे कहने पर,जबतू मेरे कूचे से गुजर पड़ी थी मेरी लंबी उम्र की चाहत थी तेरीतेरी मज़ार पे इक लाश खड़ी थी याद थी नेहार्य …

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poem, butterfly, literature

अनबन

मिरे सर से ये असर क्यों नहीं जाताबचा है जो मुख़्तसर क्यों नहीं जाता रहा खोया इश्क़ में मैं सभी भूलाबहुत सोचूँ ये कि मर क्यों नहीं जाता सुनी किसने आहटें वक़्त की फिर भीनहीं है जो वो ही डर क्यों नहीं जाता मुहब्बत रह ज़िन्द मंज़िल मगर यह क्यासफर से और इक सफ़र क्यों …

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