कहानी-बूँद बूँद ज़िन्दगी

quill, pen, write
सुनो? ज़रा उधर देखो, कितना प्यारा नज़ारा है! एक तरफ सूरज दूसरी तरफ चंद्रमा,नीचे लहराता समंदर और यहाँ धरती पर साथ में बैठे हम । पीछे देखूँ तो मुझे अब तक की अपनी सारी ज़िन्दगी में इससे खूबसूरत लम्हा नहीं दिखता ।

कुछ देर चुप रहकर मैं फिर कहता हूँ।

अच्छा,ऐसा तो नहीं कि तुम्हें देखने को ही ये सारे एक ही जगह पर आ गए हों? यूँ तुम्हारा मुझसे मिलना भी कभी-कभी ही हो पाता है,हो सकता है यही जानकर ये सब भी आ मिले हों ?

‘फालतू बातें मत करो’!

अरे इसमें फालतू क्या है, हम क्या रोज़ मिलते हैं । अपनी दायीं तरफ बैठे मुझे वो घूरती है । अच्छा ठीक है नाराज़ मत होओ,कुछ और बात करते हैं।

अजीब बात है न मीरा? कुछ देर लहरों को सुनकर मैं फिर से कहता हूँ।

क्या ?

यही कि धरती और आकाश हमेशा इतनी दूरी पर रहते हैं और हमेशा धरती और आकाश का नाम साथ ही लिया जाता है, बिल्कुल प्रेमी-प्रेमिका की तरह।

लेकिन सूरज की तेज़ रौशनी खुली आंखों से आकाश को थोड़ी देर भी तसल्ली से नहीं देखने देती ? मीरा ने कहा।

हूँ, इन दोनों के बीच सूरज बिल्कुल जीवन की तरह है । जैसे ज़िन्दगी कभी एक सी नहीं रहती वैसे ही ये सूरज इन दोनों के बीच आ जाता है । और जब धरती इस सूरज की गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाती तब आकाश जाने कहाँ से इतने सारे बादल लाकर बारिश कर देता है ।

हूँ, और ये समंदर,ये कौन है?

देखा,तुम्हारे साथ यही दिक्कत है जैसे मेरे तुम्हारे बीच में अक्सर वो आ जाता है उसी तरह तुम समंदर को इन दोनों के बीच में ले आई । मैं भौंहों को ऊपर उठाकर कुछ गुस्सा दिखाते हुए मीरा से कहता हूँ।

समंदर बिल्कुल उसी की तरह है,धरती का दूसरा प्रेमी। हमेशा धरती के साथ,उसके बहुत करीब। समंदर की विशाल बाजुओं के घेरों में ये बड़ी महफूज़ भी लगती है, कहूं कि जिस तरह लाइक माइंडेड लोगों के बीच में हम सुरक्षित महसूस करते हैं। असल में धरती के होने से ही समंदर, समंदर है। ये धरती के ख़ालीपन को भरता तो है । मगर फिर भी कोई अधूरापन इसे खाये जाता है और ये बेबस हो आकाश को तकती रहती है। उस आकाश को जो…

जो असीमित है,अनंत है ,न कोई शोर, न कोई हलचल, लगता है कि इसकी खामोशी में एक संगीत है । एकटक इसे देखती रहूँ तो कहीं खो-सी जाती हूँ। चाहती हूँ कि ज़ी खोल के रो लूँ, कह दूँ वो सब कुछ जो अनकहा है और इसे कहने से बदलेगा भी नहीं । मैं तुम्हारे आगे खुद को खोलकर रख देती हूँ, मेरे आकाश। धरती यही सोचती होगी, है ना,वशिष्ठ। हूँ, और तुम भी तो यही सोचती हो । हम दोनों कुछ देर एक दूसरे की आँखों में देखते रहते हैं । लेकिन दोनों की ही आँखों में कुछ ऐसा था जो प्रकट होकर भी रहस्य रहना चाहता है । हम भी ये बात जानते हैं इसलिए निग़ाह फेर लेते हैं ।

तुम धरती ही तो हो। लेकिन तुम पर ये ज़िन्दगी की तपिश कम क्यों नहीं होती? कभी सोचा है तुमने? नहीं न, सोचो-सोचो, यही ज़िन्दगी है मीरा, तुमने समंदर को चुना है जो तुम्हारे लिए फ़िक्रमंद तो रहता है मगर समंदर सब कुछ खुद में डुबो लेता है यही उसकी नियति है और यही तुम्हारी दुविधा भी है । मगर हम कुछ रेखाओं को लांघ ही नहीं सकते हैं

और हम ? मीरा मेरी ओर देखती रहती है

ये जो फाँसला ज़मीन और आसमान में दिखता है असल में ये फाँसला नहीं है ये तो हर रिश्ते की मर्यादा है । दो से एक हो जाने का मतलब यह तो नहीं है कि दो न रहकर एक हो जाना, वो दो ही रहते हैं। जो बदलता है वो ये कि एक तुम्हारा जीवन एक मेरा जीवन और एक हमारा जीवन । तुम आज भी मुझ तक आ ही गई न, क्या मुझ तक आने में कोई परेशानी आई, नहीं न, यही तो एक होना है । क्या नहीं है  ?

क्या हम कभी एक साथ…?मीरा को बीच में रोकते हुए मैं कहना जारी रखता हूँ…

अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई । असल समस्या यह है कि जब हम किसी को चाहते है तब हम अपनी जिम्मेदारियों का बोझ उसके सिर पर भी चढ़ाना चाहने लगते हैं और यहीं से परेशानी शुरू हो जाती है । क्या मैं गलत कह रहा हूँ?

हाँ, मीरा कुछ उखड़ते हुए कहती है । तुम्हारी परेशानी ये है कि तुम सवाल ज्यादा पूँछते हो? तुम ऐसे क्यों हो ?

मैं मीरा की ओर देखता हूँ और हंसते हुए कहता हूँ। अगर मैं ऐसा न होता तो क्या तब भी तुम मेरे साथ यहाँ मेरे पास बैठी होती । और फिर बारिश होती है तो कुछ कीचड़ भी तो हो जाती है, लेकिन कुछ देर को, फिर एक लंबी राहत। मेरे सवाल यही बारिश तो हैं। अच्छा, छोड़ो ये सब, यह बताओ कि आज कैसे आ गई तुम ?

‘बस ऐसे ही’।

हमेशा की तरह वही जवाब , मैंने कहा।

सच भी तो कह सकती हो ।

क्या ?

यही कि आज मेरी याद कुछ ज्यादा ही आ रही थी। रहा नहीं गया तो चली आई।

हूँ, वैसे भी आकाश मेरा ही तो है कोई वजह क्यों हो उससे मिलने को ?

हाँ, और वो देखो। दोनों आकाश की ओर देखते हैं । कमाल है न चंद्रमा अब कितना साफ और पूरा दिख रहा है । हमारे एक होने का दुर्लभ स्वप्न।

फिर एक लंबी खामोशी…

अब ऐसे न देखो मुझे, तुम धरती हो और गुलाब की पंखुड़ियां मुझे बहुत लुभाती हैं ।

हूँ, सब तुम्हारा है पर तुम आकाश हो न, मीरा कहती है और दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं ।

अच्छा, क्या मुलताई से सीधी यही आई हो?

हाँ, ?

कितने दिनों के लिए ?

मीरा कुछ देर सस्पेन्स बनाए रखते हुए उसकी ओर देखती रहती है ।

बोलो , क्या हुआ ?

घबराओ नहीं । इस बार 5 दिनों की छुट्टी ली है ।

बहुत बढ़िया, अब तो मैंने भी यहाँ बहुत कुछ देख लिया है । हम आराम से पूरा दिउ घूमेंगे। और अबके हम सोमनाथ भी साथ जा सकेंगे। अपनी खुशी को छुपाते हुए मैं कहता हूँ।

ठंड बहुत हो गई है और तुम्हारी चाय का वक़्त भी,चलो चाय पीते हैं ।  मीरा का हाथ अपने हाथ में थामे मैं उसे दिखाता हूँ आसमान की ओर अब सूरज नहीं है बस चन्द्रमा और तारे हैं । और यहाँ न तुम न मैं बस हम हैं। 

मेरे काँधे पर सिर टिकाए मीरा और मैं उसे एक बाँह से संभाले हुए साथ-साथ टहलते हुए चाय वाले की ओर चले जाते हैं।  पीछे रह जाता है बहुत हल्का समंदर का शोर बहुत नाज़ुक,बहुत महीन। और हम अपने दिल में यादों से भरी एक और शाम लिए चले जाते हैं, जो कुछ महीनों के एकाकीपन का ईंधन बनेगी। और फिर किसी और जगह,किसी ऐसी ही मुलाक़ात की उम्मीद लिए उलझ जाएंगे ज़िन्दगी से, जो एक होकर भी टुकड़ों में बंटी रह गई है।

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