ख़ालीपन

sunset, ponte de lima, portugal

बेकार कहें ये लोग मुझे
कहें,कोई काम नहीं आता,
तन्हा ही बैठा रहे हमेशा
गुमसुम-सा फिरता रहता है,
वो समझें मैं बर्बाद हुआ
और मैं,
मैं देखता हूँ जब शख्स कोई
तो सोचता हूँ
हर एक की वही रवानी है,
वही सुबह अखबार में खोई
दफ्तर से शाम थकी आई
और रात को बड़ा गहरा ग़म है
मानो
आती सुबह कोई मातम है,
चाभी-भरी घड़ी हो जैसे
आदमी भी चलता है वैसे,
और इनका बर्बाद मैं
इन्हें देख ये सोचता हूँ,
खालीपन क्या होता है ?
सूखा ताल भी खाली है
बिन मछली ताल भी खाली,
निर्वात वात से खाली और
महसूस न हो तो खाली वात,
लहर बिना सागर खाली और
सागर बिन बादल खाली,
हो बादल बिन आकाश भी क्या
है पौध बिना क्या क्यारी,
बिन क्यारी के बाग कहाँ
और बाग बिना क्या बस्ती,
बस्ती के बिन नगर नहीं
और नगर बिना क्या देश,
देश बिना ये आदमी
नीरस-सा एक भदेस,
जन्मा, जागा, चला-फिरा-सा
सोया,फिर मर गया,
गति न हो जीवन में तब
न मति का ये वश होता है,
किसी तरह यह जान सके कि
खालीपन क्या होता है…?

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