नज़्म:-‘जागते-जागते इक उम्र कटी हो जैसे’

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जाने क्या बात इशारात करे है दिल में
आहटें द्वार करे बेज़ार करे पल-पल में
हिज़्र की रात में अक्सर ये गुमाँ होता है
वो है यहीं छुपके मुझे देख रही हो जैसे
बंद आँखें यही महसूस किया करती है
कानों के करीब तेरी साँस उठी हो जैसे
ख़ाब की बात भी लगती है मुझे ख़ाबों-सी
तुझको न देखके आँखें भी पिघलती हैं मिरी
हलचल हो कोई भी एहसास तेरा होता है
काम को बातों में भी ध्यान तेरा चेहरा है
दरवाज़े पे नज़र रहती है मेरी पहरो-पहर
लगता है दर पे अभी तू ही रुका हो आकर
जाता हर लम्हा उमर रात की बढ़ाता है
ऐसा लगता है तेरी बात हुई हो जैसे
तेरे बिन रात ये पहली है मगर लगता है
जागते-जागते इक उम्र कटी हो जैसे

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