टुकड़ा टुकड़ा प्यार

book, heart, pansies

प्यार का न होना कोई बुरा नहीं
बिना प्यार के भी ज़िन्दा रह सकते हैं
सूखे फूलों को सहेजा जा सकता है
बुरा है उसका पंखुड़ियों में बिखर जाना
टुकड़ा टुकड़ा प्यार में कोई जी नहीं सकता
जी भी ले फिर आदमी वो रह नहीं सकता

इश्क़ हुआ था एक नादान को नादान से
तैरने से दोनों ही वो अनजान थे नादान थे
भँवर में कूद पड़े थे दोनों बाहें थाम के नादान थे
डूबके ज़िन्दा होने के अरमान थे नादान थे
भूल में दो को समझे एक ही जान थे नादान थे
उलझ गए थे अनसुलझे अंजाम से नादान थे

नखरे जो कभी सबब रहे मुस्कान के
किचन के ढेरों काम में गुमनाम थे
कभी बात-बात पर फरमाइश थी आप कहो
फरमाइश अब भी थी लेकिन मौके की बात हो
वो बालों में उंगली उलझाकर सपने देखना जागते
अब याद नहीं रहते हैं सपने कई-कई रात के
एक सुनहला ख़्वाहिशी हार था शादी बाद का
अब घर-गृहस्थी और ऑफिस ही बस याद था

हर साल लिस्ट में सर्दी-गर्मी में टूर था
अब किचन से कमरा वाया ड्राइंग रूम रुट था
वो मूवी या लांग ड्राइव और रेस्रोरेन्ट में खाना
अब हर शाम शाम का थकान से मारा जाना
कभी टूटती कमर,कभी सिर में बेजां दर्द से प्लान चौपट होते
सोचा ही नहीं हर प्लान से पहले समझौते के पट होते

धीरे-धीरे घुलने लगे घरौंदे ये बरसात में
बारिश जिम्मेदारी की थी ओले जात-समाज के
दीवारों में रहने लगे कल-पुर्जे दिल के साथ में
जीवनसाथी साथी थे बस रात के कुछ लम्हात में
सपने सारे सिमट गए थे गुजरे कल की याद में
धीरे-धीरे उतर रहे थे दिल दोनों अवसाद में

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