ग़ज़ल:- उसने क्या कीमत दी मिरी बर्बादी की

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तय्यारी हुई शुरू तुम्हारी शादी की
हो गई शुरू मुहिम मेरी बर्बादी की

तेरी गली के बाहर खुद से मिला था मैं
अर्से बाद अंगड़ाई ली आज़ादी की

अरसा बीत गया था अरसा बिताने में
झूठी बात हुई वक़्त की बादशाही की

तुम तो हरगिज़ याद नहीं मुझको,लेकिन
धुंधली तस्वीर याद है इक शहज़ादी की

मुझे ही क्यों सारी वफ़ा अता करी तूने
उसने क्या कीमत दी मिरी बर्बादी की

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