अनबन

poem, butterfly, literature

मिरे सर से ये असर क्यों नहीं जाता
बचा है जो मुख़्तसर क्यों नहीं जाता

रहा खोया इश्क़ में मैं सभी भूला
बहुत सोचूँ ये कि मर क्यों नहीं जाता

सुनी किसने आहटें वक़्त की फिर भी
नहीं है जो वो ही डर क्यों नहीं जाता

मुहब्बत रह ज़िन्द मंज़िल मगर यह क्या
सफर से और इक सफ़र क्यों नहीं जाता

रहा ना कुछ बेबसी सुन गुज़िश्ता-सा
कि वादे से मैं मुकर क्यों नहीं जाता

जफ़ा धोखा बेदर्दी दुश्मनी सब है
मैं करने को कुछ भी कर क्यों नहीं जाता

घड़े को ये मिट्टी ये मुझसे मेरी दूरी
इधर से मैं भी उधर क्यों नहीं जाता

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