कोरोना और मंथन
(आकाश, नदी और मानव का)

notebook, is empty, pen

मेरा रंग आसमानी है
मैं ये भूला था बरसों से
गए इन कुछ दिनों में पर
न जाने क्या हुआ ऐसा
मेरे दामन की सब कालिख़
मिली थी जो मुझे जबरन
मिटी कुछ इस सलीखे से
नदी को आईना करके
निहारा मैंने जब खुद को
मुझे ऐसा लगा जैसे
नया एक जन्म पाया हो
कि जैसे श्राप-मुक्ति से
पुनः देवत्व पाया हो

मैं जीवनदायिनी सबकी
मुझे माता पुकारें सब
और फिर हाल भी मेरा
किया उस माँ के ही जैसा
जो वृद्धाश्रम में है अब
उसे घर से निकला और
पिलाया मुझको विष प्याला
मगर जो बीते हैं कुछ रोज़
सांत्वना-सी देकर गए कुछ
मैं फिर से निखर रही हूँ अब
उठाकर सिर देखा ऊपर
गगन यूँ झाँकता मुझमें
छुपा हो कुछ मेरे भीतर
मैं फिर से झिलमिलती हूँ
किनारों को अब मैं हर रोज
रिझाती हूँ सताती हूँ

मैं जबसे घर में बैठा हूँ
सोचता हूँ अब क्या होगा ?
ये कैसा खेल सृष्टि का
मनुज की आहूति देता
रहूँगा जब तक ही घर में
प्राण बाकी होंगे मुझमें
यूँ ही खोया विचारों में
खिड़कियाँ खोलने पहुँचा
जो बेहोश थी कब-से
दर-ओ-दीवार ने भी तब
न जाने कितने अरसे में
बाहरी दुनिया को देखा
मैंने भी जब फ़लक देखा
दूर बहती नदी देखी
और इन दोनों के ही बीच
कई पंछी उड़ते देखे
न जाने थे कहाँ अब तक
देखकर यही नज़ारा एक
लगा आँखें बड़ी हो गई
लम्बी एक साँस खींची तो
ताजगी अरसों की पाई
होंठ अपनी हद तक फैले
मन में इक मौन छा गया था
पत्नी को पास बुलाया और
गले में हाथ डाला,फिर
घड़ियों बाहर निहारा था
और फिर लब खुले जब,तब
शब्द बस इतने ही फूटे
एक बस अपने रुकने से
प्रकृति मुस्कुराई है
हर एक ने जीवन पाया है…!

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