तुम कब इस सत्य को जानोगे

तुम कब इस सत्य को जानोगे

कोरी आस लगाते हो
हठी हृदय को बहलाये जाते हो
सुख-संयोग की प्रीति में
निज धर्म भुलाये जाते हो
दुःख-वियोग के वेदन में
अभाव की चिता जलाये जाते हो
स्वप्न के सलोनेपन में
भ्रम की डोर लपेटें जाते हो
आशा की मृग-मरीचिका में
मिथ्या प्यास बढ़ाये जाते हो
मन की क्षुधा मिटाने को
कब तक इस पथ्य को पाओगे
यहाँ खोना-पाना व्यर्थ है सब
तुम कब इस सत्य को जानोगे

जन्म और मृत्यु के मध्य
समय ही एक निर्माल्य है
यह संसार और कुछ भी नहीं
मन का मायाजाल है
अपने औ’ पराये के हेरे में
स्वयं को भुलाने वाले तुम
प्रीत औ’ पीर की घेरे में
स्वयं को झुलाने वाले तुम
व्यय-संचय के फेरे में
स्वयं को डुबाने वाले तुम
कब तक यह तथ्य भुलाओगे
यह सार-संग्रह अनर्थ है सब
तुम कब इस सत्य को जानोगे

यहाँ पाप है क्या और पुण्य है क्या
है धर्म-अधर्म का विवाद क्या
क्या नैतिक और अनैतिक क्या
यह पैमाने सब स्वार्थ के हैं
जो हित ना सधे तो व्यर्थ के हैं
जिसकी जैसी बात बनी
वैसी ही उसने लीक चुनी
और न्याय यहाँ जन्मांध है
जहाँ सत्य निरीह-सा देखता है-
कि बुद्धि का संग्राम है
धुआँ आग का परिचायक है
शक्ति का सम्मान है
जिस करवट द्रव्य का हाथ है
उसी तथ्य का मान है
सही-गलत का भेद बनाकर
किसने यहाँ पाया है क्या
यह युग-युग का प्रपञ्च अटल
जिसमें उलझा है लोक सकल
इस लोक की मृदुल-छाया छल से
इन पाँच वायु व पाँच कोष
और सात धातु के भोग से
कब तक मन को बहलाओगे
इन सब से भी प्रबल समर्थ
तुम कब इस सत्य को जानोगे

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